भारत को यूं तो फारूख इंजीनियर, सैयद किरमानी, किरण मोरे और नयन मोंगिया के रूप में अच्छे विकेटकीपर मिलते रहे हैं लेकिन महेंद्र सिंह धोनी इन सबसे हटकर थे.
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उन्होंने न सिर्फ विकेट के पीछे बल्कि विकेट के आगे भी कमाल दिखाया. रांची में सात जुलाई 1981 को जन्मे धोनी की भारतीय क्रिकेट में उदय किसी परीकथा से कम नहीं रहा. वह जल्द ही भारतीय क्रिकेट के नायक बन गये और तीन साल के अंदर उनके हाथों में टीम की कमान भी आ गयी.
उन्हें आज भी भारत का सबसे सफल कप्तान माना जाता है. उनकी अगुवाई में भारतीय टीम दुनिया की नंबर एक टेस्ट टीम बनी तो एकदिवसीय मैचों में विश्व कप जीतने में सफल रही. उन्हीं की कप्तानी में भारत ने 2007 में पहला ट्वेंटी- 20 विश्व कप जीता था.
धोनी की बल्लेबाजी की अपनी खास शैली है जिसमें तकनीक के बजाय ताकत का ज्यादा इस्तेमाल होता है. यह कह सकते हैं कि उनकी बल्लेबाजी छोटे प्रारूप के अनुरूप है लेकिन टेस्ट मैचों में कई बार उन्होंने विषम परिस्थितियों में उम्दा पारियां भी खेली. विदेशों में हालांकि वह रन बनाने के लिये तरसते रहे.
अच्छा फुटवर्क नहीं होने और रक्षात्मक बल्लेबाजी नहीं कर पाने के कारण इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया में उन्हें रनों के लिये जूझना पड़ा. उन्होंने 90 टेस्ट मैचों में 4,876 रन और 350 एकदिवसीय मैचों में 10,773 रन बनाये. इन दोनों प्रारूप में उन्होंने क्रमश: पांच और सात शतक लगाये हैं.
वह टेस्ट और वनडे दोनों में भारत की तरफ से सर्वाधिक शिकार करने वाले विकेटकीपर हैं. उनकी कप्तानी में भारत ने 60 में से 27 टेस्ट और 200 में से 110 एकदिवसीय मैच जीते. धोनी की अगुवाई में भारत ने 2007 का टी20 विश्व कप, 2011 का एकदिवसीय विश्व कप और 2013 की चैंपियंस ट्रॉफी जीती.
उन्होंने दिसंबर 2014 में टेस्ट क्रिकेट और अगस्त 2020 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लिया.
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