मुंबई अपराध जगत और इसके सरगना हमेशा हिंदी फिल्म निर्देशकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं.
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परन्तु अधिकतर फिल्में अपराध जगत का महिमा मंडन करती हुई इसकी एक बेहद काल्पनिक तस्वीर फिल्म प्रस्तुत करती हैं. इस भीड़ से परे वर्ष 1998 में प्रदर्शित फिल्म “सत्या” मुंबई अपराध जगत का अंधियारा पक्ष दर्शकों के समक्ष बेहद ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करती है. फिल्म का निर्माण रामगोपाल वर्मा और पी. सोमशेखर ने और निर्देशन रामगोपाल वर्मा ने किया.
फिल्म की कहानी लिखी अनुराग कश्यप और सौरभ शुक्ला ने. अपने प्रदर्शन के साथ ही “सत्या” ने बॉक्स ऑफिस पर फिल्म पंडितों की अपेक्षाओं को झुठलाते हुए आशातीत सफलता प्राप्त की. बिना किसी बड़े सितारे की इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाई जे. डी.
चक्रवर्ती, मनोज बाजपेयी, उर्मिला मातोंडकर, शेफाली छाया, सौरभ शुक्ला, परेश रावल, गोविन्द नामदेव, मकरंद देशपांडे, राजू मवानी, आदित्य श्रीवास्तव, राजेश जोशी, नीरज वोहरा, स्नेहल डाबी और संजय मिश्र ने. फिल्म के गीत लिखे गुलजार ने और संगीत दिया विशाल भारद्वाज ने. फिल्म का संगीत भी बेहद लोकप्रिय हुआ.
“सपने में मिलती है”, “गोली मार भेजे में”, “गीला गीला पानी”, “तू मेरे पास भी है” और “बादलों से काट काट कर” जैसे गीत संगीत प्रेमियों को खूब भाए. फिल्म ने छह फिल्मफेयर और दो स्क्रीन अवार्ड्स अपने नाम किये. “सत्या” का नाम लिया जाए और “भीखू महात्रे” का जिक्र ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता.
भीखू महात्रे की भूमिका में मनोज बाजपेयी ने अपने फिल्मी कैरियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया और उन्हें इस भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. “सत्या” 90 के दशक की सबसे प्रभावी फिल्मों और मुम्बिया अपराध जगत पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक है.
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