भारतीय फिल्म निर्माण को एक नया आयाम देने वाले शो मैन राज कपूर ने इस फिल्म के जरिये अपने सबसे छोटे बेटे राजीव कपूर को हिंदी सिने दर्शकों के रूबरू करवाया.
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फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर आशातीत सफलता प्राप्त की.1985 में प्रदर्शित हुई इस फिल्म में मन्दाकिनी भी पहली बार सिनेमा के रुपहले परदे पर नजर आई. सफेद झीनी साडी में लिपटी, झरने के नीचे गाती मन्दाकिनी ने परदे पर आग लगा दी.
फिल्म में गंगा नदी के प्रदूषण और उस वक्त के सांस्कृतिक और सामजिक प्रदूषण को एक साथ प्रस्तुत किया गया. निर्माता-निर्देशक राज कपूर ने ही फिल्म की कहानी भी लिखी थी. फिल्म महाकवि कालिदास के ग्रन्थ “आभिज्ञान शाकुंतलम” पर आधारित थी.
फिल्म में राजीव कपूर, मन्दाकिनी, दिव्या राणा, सईद जाफरी, कुलभूषण खरबंदा, रजा मुराद, सुषमा सेठ, त्रिलोक कपूर, कृष्ण धवन, मोंटी नाथ, विश्व मेहरा, उर्मिला भट्ट, गीता सिद्धार्थ और ऐ. के. हंगल ने मुख्य भूमिकाएं निभाई. संगीत के पारखी राज कपूर ने इस फिल्म में एक नए संगीतकार रविन्द्र जैन को अवसर दिया और फिल्म का संगीत जबरदस्त कामयाब हुआ.
हसरत जयपुरी और रविन्द्र जैन ने फिल्म के गीत लिखे. “तुझे बुलाएं ये मेरी बाहें”, “एक राधा एक मीरा”, “सुन साहिबा सुन” और “हुस्न पहाड़ों का” जैसे मधुर गीतों के जरिये रविन्द्र जैन ने राज कपूर के अपने ऊपर दिखाए विश्वास को सही साबित कर दिखया. उन्हें फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ.
इसके अलावा फिल्म को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक समेत कुल पांच फिल्मफेयर पुरस्कार मिले. अस्सी के दशक की यह तीसरी सबसे कामयाब फिल्म निर्देशक राज कपूर की आखिरी फिल्म भी साबित हुई.
इस फिल्म के बाद उनहोंने “हिना” फिल्म बनाने का एलान किया पर वो यह फिल्म बना न सके उनके इस सपने को बाद में उनके सुपुत्र रणधीर कपूर ने पूरा किया.
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