हिंदी फिल्म जगत में यदि फार्मूला फिल्में बनाने की महारत किसी निर्देशक में थी तो वो थे मनमोहन देसाई.
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खोया पाया, हिन्दू-मुस्लिम एकता, मां-बेटे का प्यार, देशभक्ति और हिट संगीत का तड़का आप उनकी हर फिल्म में पायेंगे. सन 1983 में “कुली” में दर्शकों को मनमोहन देसाई ने ये सभी फार्मूले सही अनुपात में मिला कर कुछ यूं प्रस्तुत किये कि फिल्म ने सफलता के नए प्रतिमान स्थापित किये.
यह फिल्म एक और वजह से भी सुर्खियों में रही, क्योंकि इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन बुरी तरह से जख्मी हो गए. उनकी जान की सलामती के लिए पूरे देश में उनके प्रशंसकों ने व्रत रखे, मन्नते मांगी और यज्ञ और हवन करवाए.
अमिताभ तो भले चंगे हुए ही इस घटना का फिल्म को भी बेहद फायदा हुआ. कुली का निर्माण व निर्देशन किया था मनमोहन देसाई ने. संवाद लिखे थे कादर खान ने और कहानी लिखी थी प्रयाग राज ने. फिल्म की कहानी का मूल विचार जीवंप्रभा एम्. देसाई का था.
अमिताभ बच्चन, रति अग्निहोत्री, ऋषि कपूर, वहीदा रहमान, शोमा आनंद, अमरीश पुरी, कादर खान, सुरेश ओबेरॉय, ओम शिवपुरी, नीलू फुले, पुनीत ईस्सर और टुन टुन फिल्म के मुख्य कलाकार थे. फिल्म का संगीत लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का था और गीत लिखे थे आनंद बक्षी ने.
फिल्म का संगीत काफी लोकप्रिय हुआ था खासतौर पर “मदीने वाले को मेरा सलाम कहना” और फिल्म का शीर्षक गीत “सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं”.
मनमोहन देसाई के पसंदीदा गायक मोहम्मद रफी की मृत्यु हो जाने के कारण इस फिल्म के गीत उनकी आवाज से मिलती जुलती आवाज वाले गायक शब्बीर कुमार ने गाये और वो रातों रात मशहूर हो गए. फिल्म पर साम्यवादी प्रभाव भी देखने को मिलता है.
कुल मिलकर “कुली” एक सर्वकालिक सफल मसाला फिल्म है जिसमे बेहतरीन अभिनय, कसी हुई पटकथा और कर्णप्रिय संगीत का ऐया शानदार मिश्रण है की दर्शक आज भी इसे भुला नहीं पाए हैं.
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