20 अक्टूबर 1995 को प्रदर्शित दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे हिंदी फिल्मों के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई.
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80 के दशक की दिशाहीन एक्शन फिल्मों के बाद 90 के दशक में बदलाव की एक ठंडी बयार बह उठी. युवा प्रेम की इस मलयानिल की शुरुआत इस परिवर्तन को लाने का श्रेय जाता है उर्जावान और संवेदनशील युवा निर्देशक आदित्य चोपड़ा को.. दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे एक युगांतरकारी फिल्म साबित हुई.
यह उन शुरुआती फिल्मों में थी जिन्होंने विदेशी बाजार की संभावनाओं को समझा और आज अप्रवासी भारतीयों को ध्यान में रख कर जो फिल्में बन रही हैं उसकी शुरुआत इसी फिल्म से हुई. प्रसिद्ध निर्देशक यश चोपड़ा के सुपुत्र आदित्य चोपड़ा ने अपनी पहली ही फिल्म से बॉलीवुड के दिग्गजों को अपनी निर्देशन क्षमता का लोहा मनवा दिया.
इस फिल्म में सब कुछ था - स्विटजरलैंड की हसीं वादियां ( जो चोपड़ा कैम्प की पहचान हैं ), पंजाब की सौंधी मिटटी की खुशबू और सरसों के खेत, नौजवानों को थिरकने पर मजबूर कर देने वाले सुमधुर गाने, भारतीय संस्कृति की पहचान करवाचौथ और सबसे बढ़कर राज और सिमरन का मिथकीय प्यार.
इस फिल्म ने शाहरुख खान और काजोल की जोड़ी को जवां दिलों की धड़कन बना दिया. फिल्म की मुख्य भूमिकाओं में थे शाहरुख खान, काजोल, अनुपम खेर, अमरीश पूरी, सतीश शाह, फरीदा जलाल, मंदिर बेदी, परमीत सेठी, पूजा रुपारेल, अचला सचदेव और करण जौहर. फिल्म का संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ.
संगीतकर द्वय जतिन-ललित ने आनंद बक्षी के गीतों को सुरों में पिरोया. फिल्म की कहानी आदित्य चोपड़ा ने लिखी और निर्माण किया उनके पिता यश चोपड़ा ने. फिल्मफेयर पुरस्कारों में फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक सहित दस फिल्मफेयर जीत कर इतिहास रच दिया ( यह रिकॉर्ड 2005 में ब्लैक ने तोडा).
फिल्म को सर्वश्रेष्ठ मनोरंजक फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. इस फिल्म ने लगातार 800 हफ्तों तक कर चल कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया और अभी भी इसका विजय रथ रुका नहीं है.
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