चम्बल के बीहड़ और डकैत हिंदी फिल्म जगत के लिए हमेशा आकर्षण का केंद्र रहे हैं पर हिंदी फिल्मों में चम्बल का प्रस्तुतिकरण वास्तविकता से बहुत दूर और फंतासी आधारित रहा है.
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निर्देशक शेखर कपूर ने इस चलन को तोड़ा और दस्यु सुन्दरी फूलन देवी की जिंदगी पर आधारित अपनी फिल्म “बैंडिट क्वीन” में उन्होंने दर्शकों के लिए चम्बल और डकैतों की जिंदगी के अनछुए पहलुओं को पूरी ईमानदारी और संजीदगी से पेश किया.
वर्ष 1994 में प्रदर्शित हुई “बैंडिट क्वीन” ही वो फिल्म थी जिसने शेखर कपूर को एक अन्तराष्ट्रीय ख्याति दिलाई. निर्माता बॉबी बेदी की यह फिल्म फूलन देवी की जिंदगी पर लिखी गयी माला सेन की किताब पर आधारित थी. फिल्म का स्क्रीनप्ले भी माला सेन ने ही लिखा और संवादों का जिम्मा उठाया रंजीत कपूर ने.
फिल्म के अधिकतर कलाकार समानांतर सिनेमा और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के जाने माने नाम थे. फिल्म में फूलन देवी की भूमिका में थी सीमा बिस्वास और उनका साथ निभाया निर्मल पांडे, मनोज बाजपेयी, सौरभ शुक्ला, रघुवीर यादव, गोविन्द नामदेव, आदित्य श्रीवास्तव, रामचरण निर्मलकर, राजेश विवेक, अनिरुद्ध अग्रवाल और शेखर कपूर ने.
फिल्म का संगीत दिया सूफियाना संगीत पुरोधा उस्ताद नुसरत फतेह अली खान ने. “सांवरे तोरे बिन जिया जाए ना”, “सजना तोरे बिना जिया मोरा” और “मोरे सैयां तो हैं परदेस” जैसे गीतों के जरिये खान साहब ने संगीत रसिकों को बेहतरीन संगीत की सौगात पेश की है.
फिल्म के लिए सीमा बिस्वास को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का और वेशभूषा के लिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ. फिल्म अपने निर्माण और प्रदर्शन के दौरान विवादों से घिरी रही पर सभी विवादों के बावजूद “बैंडिट क्वीन” एक बेहतरीन फिल्म है. हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में इसका हमेशा जिक्र किया जाएगा.
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