वर्ष 1971 में प्रदर्शित यह फिल्म एक बेहद संवेदनशील विषय को बहुत ही खूबसूरत ढंग से प्रस्तुत करती है.
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भारतीय सिनेमा के प्रख्यात निर्देशकों में से एक हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित इस फिल्म में जिन्दगी जीने का एक नया फलसफा पेशी किया गया.
फिल्म का नायक आनंद ( राजेश खन्ना ) एक असाध्य बीमारी से पीड़ित है और मृत्यु के बेहद निकट है पर वह जिंदगी के इन बचे हुए दिनों को रो धो कर नहीं बल्कि खुश रह कर बिताना चाहता है. वह कहता है की “बाबू मोशाय जिन्दगी बड़ी होनी चाहिए लम्बी नहीं”.
बाबू मोशाय की भूमिका उन दिनों संघर्षरत अमिताभ बच्चन ने की और इस फिल्म के जरिये हृषिदा ने दर्शकों को इस अपार संभावनाओं वाले कलाकार का एक अलग पक्ष दिखाया. फिल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, सुमिता सान्याल, दुर्गा खोटे, जॉनी वाकर, असित सेन, रमेश देव, दारा सिंह, ललिता पंवार व सीमा देव ने मुख्य भूमिकाएं निभाई है.
फिल्म के संगीत सलिल चौधरी का था और बेहद लोकप्रिय हुआ था, गीत योगेश और गुलजार ने लिखे थे. फिल्म के कहानी विमल दत्ता, गुलजार, हृषिकेश मुखर्जी, डी. एन. मुखर्जी और बिरेन त्रिपाठी ने लिखी थी. फिल्म का निर्माण हृषिकेश मुखर्जी और एन. सी. सिप्पी ने किया था.
फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ संवाद सहित छह फिल्मफेयर पुरस्कार जीते और यह भारतीय फिल्म इतिहास की श्रेष्ठ फिल्मों में से एक मानी जाती है.
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