समानांतर सिनेमा के सशक्त हस्ताक्षर गोविन्द निहलानी ने हिंदी फिल्म जगत में कदम रखा वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म “आक्रोश” से.
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निहलानी जैसे निर्देशक, विजय तेंदुलकर जैसे लेखक और नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल और अमरीश पुरी जैसे दिग्गज अभिनेता मिलकर “आक्रोश” को एक अविस्मरनीय फिल्म बना देते हैं. “आक्रोश” एक गरीब आदिवासी के शोषण की मार्मिक कहानी है जो देखने वालों के रौंगटे खड़े कर देती है और समाज के ठेकेदारों के कुत्सित चेहरों से नकाब हटाती है.
फिल्म का अंत दर्शकों को स्तब्ध कर देता है और दर्शकों के दिल में एक टीस छोड़ जाता है जब न्यायिक व्यवस्था से हारा हुआ भीखू ( ओम पुरी ) अपनी पत्नी के बलात्कारियों के हाथों से अपनी किशोर बहन को बचाने के लिए उसकी हत्या कर देता है.
फिल्म हमारे देश के दोषपूर्ण न्यायिक व्यवस्था पर करारी चोट करती है. फिल्म की कहानी विजय तेंदुलकर की थी और संवाद लिखे थे सत्यदेव दुबे ने. फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में थे नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, अमरीश पुरी, मोहन अगाशे और अच्युत पोतदार. फिल्म का संगीत अजित वर्मन का था.
“आक्रोश” ने फिल्मफेयर पुरस्कारों में सर्वश्रष्ठ अभिनेता (नसीरुद्दीन शाह), सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (गोविन्द निहलानी ) और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता (ओम पुरी) समेत छह पुरस्कारों पर कब्जा जमाया. फिल्म को वर्ष 1980 की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. भारतीय अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में “आक्रोश” ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का स्वर्ण कमल भी अपने नाम किया. फिल्म का निर्माण एन.एफ.डी.सी.
और देवी दत्त ने मिलकर किया. फिल्म का विषय, कमाल का अभिनय और बेहतरीन निर्देशन सब मिल कर “आक्रोश” को एक विशेष दर्जा प्रदान करते है
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