निर्माता-निर्देशक बिमल रॉय की सफल फिल्म “मधुमती” से भारतीय फिल्मों में पुनर्जन्म के विषय पर आधारित फिल्मों की शुरुआत हुई.
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सन 1958 में प्रदर्शित हुई “मधुमती” ने बॉक्स ऑफिस पर कमाल कर दिखाया और दर्शकों को अपना दीवाना बना दिया. फिल्म कई अन्य सफल हिंदी फिल्मों की प्रेरणा बनी. दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला की सफल जोड़ी ने इस फिल्म में भी अपना जादू दर्शकों पर चला दिया. उनका साथ दिया प्राण, जॉनी वाकर, जयंत, रामायण तिवारी और रणजीत सूद ने.
फिल्म की कहानी लिखी थी ऋत्विक घटक ने और संवाद लिखे थे राजेंद्र सिंह बेदी ने. फिल्म के संगीत ने संगीत प्रेमियों के दिलों को जीत लिया. शैलेन्द्र के गीतों को सुरों में सजाया था सलिल चौधरी ने.
कौन भूल सकता है “सुहाना सफर और से मौसम हसीं”, “आजा रे परदेसी”, “दिल तड़प तड़प के दे रहा है”, “घड़ी घड़ी मेरा दिल धडके”, “जुल्मी संग आंख लड़ी” और “जंगल में मोर नाचा किसने देखा” जैसे सदाबहार गीतों को.
फिल्म ने फिल्मफेयर पुरस्कारों में नौ फिल्मफेयर जीत कर एक कीर्तिमान स्थापित किया जिसे 37 वर्षों के बाद “दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे” ने तोडा.“मधुमती”पचास के दशक की पांचवी सबसे कामयाब और बिमल रॉय की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक है.
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