वाजिद अली शाह (1822-1887) अवध के आखिरी नवाब थे, जिन्होंने 1847 से 1856 तक शासन किया.
विस्तार
फरवरी 1856 में अंग्रेजों ने अवध को अपने राज्य में मिला लिया और उन्हें कलकत्ता के मटियाबुर्ज भेज दिया गया. वह कवि, नाटककार और कलाओं के बड़े संरक्षक थे. कथक और ठुमरी के विकास में उनका बड़ा योगदान माना जाता है.
वह “अख्तरपिया” नाम से रचनाएं करते थे, और प्रसिद्ध ठुमरी “बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए” उन्हीं की रचना मानी जाती है. एक सितंबर 1887 को उनका निधन हुआ.
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